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सामाजिक मूल्यों के अनुसार मानव व्यवहार का परिवर्तन एवं परिमार्जन

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सामाजिक मूल्यों के अनुसार मानव व्यवहार का परिवर्तन एवं परिमार्जन भी होता है। व्यक्ति अपने व्यवहारों की अभिव्यक्ति सामाजिक सीमाओं में ही करता है और वह सामाजिक सीमाओं के उल्लंघन का प्रयास नहीँ करता है। ऐसा करने से वह समाज का सम्मानित सदस्य ही नहीं माना जाता है वरन् व्यक्ति अपने को सुरक्षित भी अनुभव करता है। व्यक्ति सभी सामाजिक परिस्थितियों से एक समान व्यवहार नहीं करता है, वह सभी परिस्थितियों के सामाजिक मांगो पर विचार करना है और सामजिक मांगों के अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन एवं परिमार्जन करके परिष्कृत व्यवहार को अभिव्यक्ति करता है। व्यक्ति का यह व्यवहार एक समाज से दूसरे समाज, एक समूह से दूसरे समूह, एक स्थान से दूसरे स्थान तथा एक समय से दूसरे समय पर सामजिक मागी एवं परिस्थितिजन्य कारणों से परिवर्तित होता रहता है। व्यक्ति के द्वारा प्रकट किया गया एक ही व्यवहार कभी समाजविरोधी और कभी सामान्य हो सकता है, परन्तु यह सामाजिक नियमों एवं परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जब व्यक्ति अपने व्यवहार प्रदर्शन में सामाजिक नियमों का पालन नहीं करता, उसके व्यवहार सामाजिक माँगों तथा परिस्थितियों के अनुकूल एवं उपयुक्त नहीँ होते है, तथा उसका व्यवहार समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार के अनुरूप नाते होता हैं तो उसके व्यवहार को समाज विरोधी व्यवहार या मनोविकारों व्यवहार कहते है। जो व्यक्ति इस प्रकार के व्यवहारों का प्रदर्शन करता है, उसका व्यक्तित्व समाज विरोधी व्यक्तित्व या मनोविकारों व्यक्तित्व कहलाता है। समाज विरोधी व्यक्तित्व के लिए अनेक पर्यायवाची ज्ञाब्दों यथा गठन संबंर्धा मनोविकारों हीनता नैतिक मूढ़ता समाजविकारी आदि का प्रयोग किया जाता है।
समाज विरोधी व्यक्तिव के मनोथिवारी व्यक्तित्व ज्ञाब्द को पर्यायवाची के रूप में इसलिए प्रयोग किया गया वचोंकिं व्यक्तित्व संबंधी मनोविकारों के कास्या ही असामाजिक व्यक्तित्व का अम्युदय होता है। फ्रायड, एडलर एल चुग आदि मनोवेज्ञानिको ने व्यक्तित्व संबंधी मनोविकारों के उपचार का प्रयास किया। समाजविरोधी व्यक्तित्व को ज्वाठन संबंधी मनोविकारों हीँनत्ता कहा गया है। इसका कारण यह है कि शारीरिक गठन संबंधी हीनता के काश्या भी व्यक्ति में असामाजिक व्यवहार उत्पन्न हो सकते है। जैसे कृष्टाकाय प्रकार के व्यक्ति चिड़चिड़े, झगड़ालु तथा होते है। इसके अतिरिक्त इसकी व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है कि जब व्यक्ति के शारीरिक गठन में किसी प्रकार की अपूर्णता पाई जाती है तब उसमें हीनता की ग्रन्थियाँ उत्पन्न हो जाती है। समाज विरोधी व्यक्तित्व को नैतिक भूलता इसलिए कहते है वर्थाकि नैतिक मूढ़ व्यक्तियों में बौद्धिक योग्यता की कमी पाई जाती है। जिससे व्यक्ति असामाजिक व्यवहार करने लगता है। लेकिन कभी ऐसा भी देखा जाना है कि असामाजिक बनाये गये है, वे सामाजिक नियमों की अवेहेलना करते है और नियमो को तोड़ते रहते हैँ। वह संघटित प्राधिकार को स्वीकार नहीं करते है और ऐसा करते समय वे आदेशो, आक्रामक औरे आपराधिक कयों को करते हैं। शैक्षिक एवं कानून लागू करनेवाले प्राधिकार व्यक्तियों के प्रति इनका विरोधी व्यवहार होता है। ऐसे व्यक्ति अक्सर अश्यथजन्य कार्यो को करते हैं। यद्यपि यह पेशेवर अपराधी नहीं होते हैं। समाज-विरोधी कार्यों के लिए मिलनेवाले कष्ट एवं दण्ड के बारे में दान रहने के बावजूद भी वह अपने कार्यों के परिणामों से चिन्तित नहीं होते हैं।
अच्छा अन्तवैश्यक्तिक संबंध बनाये रखने की अयोग्यता -यद्यपि समाज-विरोधी व्यक्ति दूसरों को मित्र बनाने में योग्य होते है, परन्तु इनके घनिष्ट मित्रों का अभाव होता है। यह मित्र तो बना लेते है पर मित्रता का निर्वाह नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्ति अपने व्यवहार में गैर जिम्मेदार, आत्मकेन्द्रित. निन्दक, बेदर्द एवं कृतघ्न होते है तथा अपने समाज-विरोधी कार्यों पर इन्हें पश्चताप नहीं होता है। यह न तो दूसरों के प्रेमपूर्ण व्यवहार कर समझ पाते है और उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित ही कर पाते है। ऐसे व्यक्ति अपने परिचितों से भय ही नहीं उत्पन्न करते है, वरन् उन्हें अधिक दुखी भी कर देते है, |
विस्फोटक व्यक्तित्व -इस व्यवहार प्रतिरूप की प्रमुख विशेषता यह है कि ऐसे व्यवहार प्रतिरूप वाले व्यक्ति अधिक उत्साहपूर्ण तथा शारीरिक आक्रमक व्यवहार करते है यही नहीं यह लोग बरबस अपना क्रोध प्रकट करने लगते हैँ। ऐसे क्रोध का प्रदर्शन उनके सामान्यतया प्रकट होने वाले व्यवहार से भिन्न होता है, ऐसे व्यक्तित्व के व्यक्ति अपने बरबस क्रोध के लिए खेद भी प्रकट करते है और पश्चताप भी करते है। ऐसे व्यक्तित्व वातावरणीय दबावों के प्रति सामान्यतया उतेजित एवं अति प्रतिंक्रियाशील भी होते है। बरबस क्रोध तथा क्रोध को नियंत्रित्त करने की अयोग्यता के कारण ऐसे व्यक्ति दूसरे लोगों से भिन्न समझे जाते हैं।
मनोगाग्रस्त-बाध्यता व्यक्तित्व- इस व्यवहार प्रतिरूप की प्रमुख विशेषता यह है कि व्यक्ति के मन में निरन्तर उठनेवाले अस्वागत योग्य विचार पाए जाते है , जिनके प्रति उनमें वाध्यताएँ पाई जाती है। व्यक्ति स्वय जानता है कि यह विचार निरर्थक ताश अविवेकपूर्ण है फिर भी वह इन विचारों से छुटकारा नहीँ प्राप्त का पाता है और सब कुछ जानते हुए भी उसी व्यवहार को करने के लिए बाध्य रहता है।मनोग्रस्त्ता बाध्यता व्यक्तित्व के लोग अपने व्यवहारों में अपने कर्तव्यों एवं अन्तरात्मा के आदर्शो के प्रति अत्यधिक दक्षता प्रदर्शित करते है। यह व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति इतने अधिक अति अवरोधित होते है कि इन्हें विश्राम करने का अवसर नहीं मिलता है। यह विकृति इनमे प्रारंभ में साधारणा रूप में ही पाई जाती है लेकिन आगे चलकर इसका रूप उग्र हो जाता है और व्यक्तित्व समाज-विरोधी हो जाता है।
उन्मादी व्यक्तित्व -ऐसे व्यक्तित्व के लोगो से अपरपिवदता, उतेज़नशीलता, सावेगिक अस्थिरता एवं स्व-नाटकीयता की विशेषता पाई जाती है। व्यक्ति को अपने अभिप्रेरकों के बारे में ज्ञान हो या न हो, परन्तु व्यक्ति रकंनाटकीक्ररषा के द्वारा दूसरों के ध्यान को आकर्षित करते है। यही नहीं ऐसे व्यक्ति सम्पोहक भी होते हैँ। जो व्यक्ति उन्मादी व्यक्तित्व वर्गीकरण के अन्तर्गत आते है, वे आत्मकेद्रित होते है तथा अपने व्यवहारों का अनुमोदन समाज के दूसरे व्यक्तियों द्वारा चाहते है।
Pt.P.S.Tripathi
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