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दक्षिणावर्ती शंख और उसके उपयोग

दक्षिणावर्ती शंख और उसके उपयोग

भारतीय संस्कृति में शंख की अपार महिमा एवं उपयोगिता बताई गई है। शंख समृद्धिदायक, दरिद्रता नाशक, आयुवर्द्धक के साथ-साथ देवी-देवताओं के पूजन के लिए, ज्योतिष और तांत्रिक साधनाओं में एवं शुभ कार्य के प्रारंभ में इसकी विशेष उपयोगिता बताई गई है। ये समुद्र में लगभग सभी जगह मुख्य रूप से पाए जाते हैं। मालदीव, श्री लंका, अंडमान निकोबार, हिंद महासागर, अरब सागर व प्रशांत महासागर में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। मुख्यतः शंख वामवर्ती होते हैं एवं दक्षिणावर्ती शंख दस प्रतिशत से भी कम पाए जाते हैं। इसको जानने के लिए कि यह दक्षिणावर्ती है या वामवर्ती शंख के मस्तक को अपनी और व धारा मुख को बाहर की तरफ रखे और दायां भाग खुला हो तो वह दक्षिणावर्ती शंख होता है तथा जिसका बायां भाग खुला हो वह वामवर्ती शंख होता है। सामन्यतः दक्षिण् ाावर्ती शंख बाएं हाथ से पकड़ने में सुविधापूर्वक आता है एवं वामवर्ती शंख को दाएं हाथ से पकड़ने में सुविधा होती है। यदि शंख को बजाना हो तो वामवर्ती शंख को दाएं हाथ में पकड़ कर ही बजा पाएंगे। दक्षिणावर्ती शंख को दांए हाथ में पकड़कर बजाने में असुविधा होती है। इसलिए बजाने वाले शंख वामवर्ती ही होते हैं। प्रकृति में पचास हजार से भी अधिक प्रकार के शंख पाए जाते हैं। कुछ खारे पानी में तो कुछ मीठे पानी में इनके आकर भी एक मिली मीटर से लेकर चालीस इंच तक होते हैं।

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ये अनेकों रंगों में एवं एक ग्राम से कई किलो तक के वजन में पाएं जाते हैं। शंख भगवान विष्णु के चतुर्भज स्वरूप में हस्त का एक आभूषण हैं, महाभारत में भी भगवान कृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाकर युद्ध की शुरुआत की थी। आयुर्वेद में शंख भस्म अनेकों प्रकार के रोगों को दूर करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। बौद्ध धर्म में शंख को अष्ट मंगल (शंख, श्रीवत्स, मत्स्य, पद्म छत्र कलश चक्र ध्वज) पदार्थों में से एक है। दक्षिणावर्ती शंख एक बड़े समुद्री जीव का बाहरी हिस्सा है जो कि भारत के दक्षिण में हिंद महासागर में पाया जाता है इसका जीव विज्ञान में टर्बिनेला पायरम नाम हैं शंख को बजाने से बातावरण की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। इससे आशा, आत्मबल, शक्ति व दृढ़ता बढ़ती है, तथा भय नष्ट होता है। श्रद्धा व विश्वास जागृत होता है। भाग्य और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड एवं शंख की आकृति समान है। शंख के अंदर का घेरा ब्रह्मांड की कुंडली (स्पाइरल) की तरह होता है। शंख में गूंजने वाला स्वर ब्रह्मांड की गूंज के समान है, शब्द की गूंज भी शंख के द्वारा गुंजायमान ध्वनि जैसी ही होती है।

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