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जानिए,काल सर्प क्या है,ये रहा इसका विश्लेषण…

जानिए,काल सर्प क्या है,ये रहा इसका विश्लेषण…

काल सर्प क्या है,ये रहा इसका विश्लेषण

काल सर्प योग राहु से केतु के मध्य अन्य सभी ग्रहों के आ जाने से बनता है। जब राहु से केतु के मध्य अन्य ग्रह होते हैं, तो उदित और जब केतु से राहु के मध्य होते हैं, तो अनुदित काल सर्प योग की रचना होती है। राहु जिस भाव में स्थित होता है उसी के अनुसार 12 प्रकार के काल सर्प योग बनते हैं। उनका फल भी उन्हीं भावों के अनुसार कहा गया है, जिसका विवेचन इस पत्रिका में विस्तार से किया गया है।काल सर्प योग को समझने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है राहु और केतु को समझना। राहु और केतु क्या हैं यह निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है।

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक समतल में करती है। चंद्रमा भी पृथ्वी की परिक्रमा एक समतल में करता है।लेकिन यह पृथ्वी के समतल से एक कोण पर रहता है। दोनों समतल एक दूसरे को एक रेखा पर काटते हैं। एक बिंदु से चंद्रमा ऊपर और दूसरे से नीचे जाता है। इन्हीं बिंदुओं को राहु और केतु की संज्ञा दी गई है।

सूर्य, चंद्र, राहु एवं केतु जब एक रेखा में आ जाते हैं, तो चंद्र और सूर्य ग्रहण लगते हैं। जब राहु और केतु की धुरी के एक ओर सभी ग्रह आ जाते हैं, तो काल सर्प योग की उत्पत्ति होती है।

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यह योग तभी बनता है जब सभी ग्रहों के साथ गुरु और शनि भी एक ओर आ जाएं। क्योंकि राहु और केतु के अतिरिक्त केवल शनि और गुरु ही धीमी गति से चलते हैं, अतः शनि व गुरु का एक ओर आ जाना ही काल सर्प योग की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण होता है। सूर्य, बुध व शुक्र तो प्रायः साथ ही रहते हैं और चंद्रमा शीघ्रगामी है, अतः गुरु व शनि के अतिरिक्त मंगल की स्थिति काल सर्प योग के होने अथवा न होन
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कालसर्प योग से संबंधित कुछ मुख्य तथ्य

सूर्य की गति के कारण काल सर्प योग कभी भी 6 महीने से अधिक अवधि के लिए नहीं आता।
इन 6 महीनो में भी चंद्रमा की गति के कारण 2 सप्ताह यह योग रहता है और 2 सप्ताह नहीं रहता। जब कभी चंद्रमा धुरी से बाहर हो जाता है, तब यह आंशिक काल सर्प योग कहलाता है।

प्रति वर्ष काल सर्प योग की उत्पत्ति नहीं होती, बीच में कई वर्षों तक यह योग नहीं बनता है।यह योग 2-3 बार उदित रूप से बनने के पश्चात 2-3 बार अनुदित रूप से और पुनः उदित रूप से बनता है।राहु को गुरु को पुनः स्पर्श करने में 7 वर्ष 2 माह लगते हैं। अतः उदित अनुदित भी लगभग 7 वर्ष के चक्र में बनते हैं।काल सर्प योग की सटीक गणना करने के लिए राहु व केतु के अंशों से अन्य ग्रहों के अंशों को देखना चाहिए। उदित काल सर्प योग में अन्य ग्रहों के अंश राहु से कम व केतु से अधिक होने चाहिए जबकि अनुदित में इसके विपरीत।खगोल सिद्धांत के अनुसार उदित व अनुदित रूप में काल सर्प योग में केवल राहु से अन्य ग्रहों की स्थिति में अंतर है। अतः फलादेश में अनुदित का फल भी उदित के समरूप ही समझना चाहिए।

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