आज समाज में व्यक्ति के आत्मकेन्द्रित हो जाने से परिवार के अन्दर स्नेहसूत्र का डोर कमजोर होता जा रहा है और इस स्नेहसूत्र की मुख्य कड़ी वैवाहिक रिष्तों की डोर टूटकर कहीं बिखरती जा रही है। सामाजिकता के प्रभावहीन हो जाने के कारण मनुष्य निरन्तर अकेला होता जा रहा है और इसी अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिये व्यक्ति ने भारत में परिवार की संस्था का विनाश करना आरम्भ कर दिया है। समाज में हो रहे कई परिवर्तन इसके कारण हैं. और इन कई कारणों में से हो सकता है कि पति या पत्नि की एक दूसरे से असंतुष्टि, पति या पत्नी का एक दूसरे से लगाव या प्रेम की कमी, एक दूजे के लिए समय का अभाव, आपसी समझ या सदभावना का अभाव। वैवाहिक रिष्तों में आपसी प्रेम के अलावा अन्य किसी से संबंध का होना, कमजोर होते सामाजिक और मानवीय रिष्तों के अलावा, इसका ज्योतिषीय कारण भी है-
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