
मकर संक्रांति को दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भी 14 जनवरी को या उसके आसपास ही आता है। पोंगल मुख्य रूप से तमिलनाडु, कर्नाटका, तेलंगाना, और आंध्र प्रदेश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से प्रकृति और कृषि को समर्पित त्योहार है, जिसमें विशेष रूप से विभिन्न देवताओं की पूजा की जाती है।
1. सूर्य देव (Lord Surya)
2. इंद्र देव (Lord Indra):
3. मवेशी (नंदी/बैल):
पोंगल 2026 का शुभ समय
- थाई पोंगल बुधवार, 14 जनवरी 2026 को
- थाई पोंगल संक्रांति का क्षण- दोपहर 03:13 पर।
- मकर संक्रांति- बुधवार, 14 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी।
मट्टू पोंगल पर पशु देवता और नंदी की पूजा
पोंगल का तीसरा दिन मट्टू पोंगल कहलाता है, जो पूरी तरह से गाय, बैल और पशुधन को समर्पित होता है।
मट्टू पोंगल में किसकी पूजा होती है?
- गौ माता
- नंदी देव (भगवान शिव के वाहन)
- बैल और कृषि में सहायक पशु
धार्मिक मान्यता
- गाय को माता का दर्जा प्राप्त है
- बैल किसान का सबसे बड़ा सहायक होता है
- नंदी को कृषि, बल और धर्म का प्रतीक माना जाता है
इस दिन पशुओं को स्नान कराया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं, फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं और विशेष पूजा की जाती है।
भगवान शिव से जुड़ी मान्यता
पोंगल पर्व का अप्रत्यक्ष संबंध भगवान शिव से भी जुड़ा है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी को पृथ्वी पर जाकर मनुष्यों को संदेश देने भेजा था। संदेश में त्रुटि होने के कारण शिव ने नंदी को दंड स्वरूप पृथ्वी पर रहकर कृषि कार्य में मनुष्यों की सहायता करने को कहा।
इसी कारण मट्टू पोंगल पर नंदी और पशुओं की पूजा की जाती है और भगवान शिव का स्मरण किया जाता है।
पोंगल का आध्यात्मिक संदेश
पोंगल पर्व हमें सिखाता है:
- कृतज्ञता का भाव रखना
- प्रकृति का सम्मान करना
- परिश्रम का फल बांटना
- अहंकार छोड़कर सामूहिक जीवन अपनाना
यह पर्व बताता है कि मनुष्य अकेला नहीं, बल्कि सूर्य, पृथ्वी, पशु और प्रकृति के सहयोग से जीवन जीता है।
निष्कर्ष
पोंगल पर मुख्य रूप से सूर्य देव की पूजा होती है, लेकिन इसके साथ-साथ पृथ्वी माता, गौ माता, नंदी देव, पशुधन और प्रकृति के सभी तत्वों का सम्मान किया जाता है। पोंगल केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह जीवन दर्शन, कृषि संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समृद्धि केवल धन से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन और कृतज्ञता से आती है। पोंगल के माध्यम से मनुष्य सूर्य, धरती और जीवनदायिनी शक्तियों को नमन कर एक नए, शुभ और सकारात्मक जीवन चक्र की शुरुआत करता है।





